गणतंत्र दिवस पर कविता |  Republic Day Par Kavita – Poems on Republic Day in Hindi – Republic Day 2026

गणतंत्र दिवस पर कविता |  Republic Day Par Kavita – Poems on Republic Day in Hindi – Republic Day 2026

Republic Day par Kavita: गणतंत्र दिवस आ चुका है और इस मौके पर स्कूल-कॉलेज समेत कई संस्थानों में प्रतियोगिताओं और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। यहांं हम आपके लिए ऐसी 10 कविताएं लेकर आए हैं जिनका इस्तेमाल आप गणतंत्र दिवस समारोह में सुनाने के लिए बेझिझक कर सकते हैं। आशा करता हूँ कि आप सभी को यह कविताओं “गणतंत्र दिवस पर कविता |  Republic Day Par Kavita – Poems on Republic Day in Hindi – Republic Day 2026” का संग्रह अच्छा लगेगा !

गणतंत्र दिवस पर कविता

26th January Poems in Hindi: गणतंत्र दिवस 26 जनवरी को हर साल मनाया जाता है। इस दिन हमारा संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ। यहां हम आपके लिए रिपब्लिक डे की 10 शानदार कविताएं लाए हैं जिन्हें सुनाकर आप हर किसी के दिल को जीत सकते हैं। यह कविताएं देश भक्ति भावना भरी हैं और इनमें से कईयों को आपने अपने स्कूलों की किताब में भी पढ़ा होगा। आइए यहां पर एक नजर डालते हैं कुछ मशहूर लेखक और कवियों को देशभक्ति कविताओं पर जो 26 जनवरी के दिन आपके काम आ सकती हैं।

चाह नहीं, मैं सुरबाला के गहनों में गूंथा जाऊं।
चाह नहीं, प्रेमी-माला में बिंध प्यारी को ललचाऊं॥
चाह नहीं, सम्राटों के शव पर, हे हरि, डाला जाऊं।
चाह नहीं, देवों के सिर पर चढूं, भाग्य पर इठलाऊं॥
मुझे तोड़ लेना वनमाली!
उस पथ में देना तुम फेंक॥
मातृ-भूमि पर शीश चढ़ाने।
जिस पथ जावें वीर अनेक॥

Republic Day Par Kavita – वीरो का कैसा हो वसंत?

वीरों का कैसा हो वसंत?
आ रही हिमाचल से पुकार,
है उदधि गरजता बार-बार,
प्राची, पश्चिम, भू, नभ अपार,
सब पूछ रहे हैं दिग्-दिगंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
फूली सरसों ने दिया रंग,
मधु लेकर आ पहुंचा अनंग,
वधु-वसुधा पुलकित अंग-अंग,
हैं वीर वेश में किंतु कंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
भर रही कोकिला इधर तान,
मारू बाजे पर उधर गान,
है रंग और रण का विधान,
मिलने आये हैं आदि-अंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
गलबांहें हों, या हो कृपाण,
चल-चितवन हो, या धनुष-बाण,
हो रस-विलास या दलित-त्राण,
अब यही समस्या है दुरंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
कह दे अतीत अब मौन त्याग,
लंके, तुझमें क्यों लगी आग?
ऐ कुरुक्षेत्र! अब जाग, जाग,
बतला अपने अनुभव अनंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
हल्दी-घाटी के शिला-खंड,
ऐ दुर्ग! सिंह-गढ़ के प्रचंड,
राणा-ताना का कर घमंड,
दो जगा आज स्मृतियाँ ज्वलंत,
वीरों का कैसा हो वसंत?
भूषण अथवा कवि चंद नहीं,
बिजली भर दे वह छंद नहीं,
है क़लम बँधी, स्वच्छंद नहीं,
फिर हमें बतावे कौन? हंत!
वीरों का कैसा हो वसंत?

Poems on Republic Day in Hindi जगदंबा प्रसाद मिश्र ‘हितैषी’ – शहीदों की चिताओं पर

उरूजे कामयाबी पर कभी हिंदोस्ताँ होगा।
रिहा सैयाद के हाथों से अपना आशियाँ होगा॥

चखाएँगे मज़ा बर्बादी-ए-गुलशन का गुलचीं को।
बहार आ जाएगी उस दम जब अपना बाग़बाँ होगा।

ये आए दिन की छेड़ अच्छी नहीं ऐ ख़ंजर-ए-क़ातिल।
पता कब फ़ैसला उनके हमारे दरमियाँ होगा॥

जुदा मत हो मेरे पहलू से ऐ दर्दे वतन हरगिज़।
न जाने बाद मुर्दन मैं कहाँ औ तू कहाँ होगा॥

वतन के आबरू का पास देखें कौन करता है।
सुना है आज मक़तल में हमारा इम्तहाँ होगा॥

शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले।
वतन पर मरनेवालों का यही बाक़ी निशाँ होगा॥

कभी वह दिन भी आएगा जब अपना राज देखेंगे।
जब अपनी ही ज़मीं होगी और अपना आसमाँ होगा॥

कदम कदम बढ़ाए जा – वंशीधर शुक्ल

क़दम क़दम बढ़ाए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा;

ये ज़िंदगी है क़ौम की,
तू क़ौम पे लुटाए जा।

उड़ी तमिस्र रात है, जगा नया प्रभात है,
चली नई जमात है, मानो कोई बरात है,

समय है, मुस्कुराए जा,
ख़ुशी के गीत गाए जा।

ये ज़िंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाए जा।

जो आ पड़े कोई विपत्ति मार के भगाएँगे,
जो आए मौत सामने तो दाँत तोड़ लाएँगे,

बहार की बहार में
बहार ही लुटाए जा।

क़दम क़दम बढ़ाए जा,
ख़ुशी के गीत गाए जा।

जहाँ तलक न लक्ष्य पूर्ण हो समर करेंगे हम,
खड़ा हो शत्रु सामने तो शीश पै चढ़ेंगे हम,

विजय हमारे हाथ है
विजय-ध्वजा उड़ाए जा।

क़दम क़दम बढ़ाए जा,
ख़ुशी के गीत गाए जा।

क़दम बढ़े तो बढ़ चले, आकाश तक चढ़ेंगे हम,
लड़े हैं, लड़ रहे हैं, तो जहान से लड़ेंगे हम;

बड़ी लड़ाइयाँ हैं तो
बड़ा क़दम बढ़ाए जा।

क़दम क़दम बढ़ाए जा
ख़ुशी के गीत गाए जा।

निगाह चौमुखी रहे, विचार लक्ष्य पर रहे,
जिधर से शत्रु आ रहा उसी तरफ़ नज़र रहे,

स्वतंत्रता का युद्ध है,
स्वतंत्र होके गाए जा।

क़दम क़दम बढ़ाए जा,
ख़ुशी के गीत गाए जा।

ये ज़िंदगी है क़ौम की
तू क़ौम पे लुटाए जा।

आज देश की मिट्टी बोल उठी है – शिवमंगल सिंह ‘सुमन’

Republic Day Par Kavita – Poems on Republic Day in Hindi – Republic Day 2026

लौह-पदाघातों से मर्दित
हय-गज-तोप-टैंक से खौंदी
रक्तधार से सिंचित पंकिल
युगों-युगों से कुचली रौंदी।
व्याकुल वसुंधरा की काया
नव-निर्माण नयन में छाया।
कण-कण सिहर उठे
अणु-अणु ने सहस्राक्ष अंबर को ताका
शेषनाग फूत्कार उठे
सांसों से निःसृत अग्नि-शलाका।
धुआंधार नभी का वक्षस्थल
उठे बवंडर, आंधी आई,
पदमर्दिता रेणु अकुलाकर
छाती पर, मस्तक पर छाई।
हिले चरण, मतिहरण
आततायी का अंतर थर-थर काँपा
भूसुत जगे तीन डग में ।
बामन ने तीन लोक फिर नापा।
धरा गर्विता हुई सिंधु की छाती डोल उठी है।
आज देश की मिट्टी बोल उठी है।

गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’ – स्वदेश का प्यार

वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥
जो जीवित जोश जगा न सका,
उस जीवन में कुछ सार नहीं।
जो चल न सका संसार-संग,
उसका होता संसार नहीं॥
जिसने साहस को छोड़ दिया,
वह पहुंच सकेगा पार नहीं।
जिससे न जाति-उद्धार हुआ,
होगा उसका उद्धार नहीं॥
जो भरा नहीं है भावों से,
बहती जिसमें रस-धार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥
जिसकी मिट्टी में उगे बढ़े,
पाया जिसमें दाना-पानी।
है माता-पिता बंधु जिसमें,
हम हैं जिसके राजा-रानी॥
जिसने कि खजाने खोले हैं,
नवरत्न दिये हैं लासानी।
जिस पर ज्ञानी भी मरते हैं,
जिस पर है दुनिया दीवानी॥
उस पर है नहीं पसीजा जो,
क्या है वह भू का भार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥
निश्चित है निस्संशय निश्चित,
है जान एक दिन जाने को।
है काल-दीप जलता हरदम,
जल जाना है परवानों को॥
है लज्जा की यह बात शत्रु—
आये आंखें दिखलाने को।
धिक्कार मर्दुमी को ऐसी,
लानत मर्दाने बाने को॥
सब कुछ है अपने हाथों में,
क्या तोप नहीं तलवार नहीं।
वह हृदय नहीं है पत्थर है,
जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं॥

अल्लामा इकबाल – सारे जहां से अच्छा… गणतंत्र दिवस पर कविता |  Poems on Republic Day in Hindi

सारे जहां से अच्छा हिन्दोस्तां हमारा
हम बुलबुलें हैं इस की ये गुलसितां हमारा
गुर्बत में हों अगर हम रहता है दिल वतन में
समझो वहीं हमें भी दिल हो जहां हमारा
पर्बत वो सब से ऊंचा हम-साया आसमां का
वो संतरी हमारा वो पासबां हमारा
गोदी में खेलती हैं इस की हजारों नदियां
गुलशन है जिन के दम से रश्क-ए-जिनां हमारा
ऐ आब-रूद-ए-गंगा वो दिन है याद तुझ को
उतरा तिरे किनारे जब कारवां हमारा
मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
हिन्दी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा
यूनान ओ मिस्र ओ रूमा सब मिट गए जहां से
अब तक मगर है बाकी नाम-ओ-निशां हमारा
कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
सदियों रहा है दुश्मन दौर-ए-ज़मां हमारा

सिपाही – माखन लाल चतुर्वेदी – गणतंत्र दिवस पर कविता in Hindi

गिनो न मेरी श्वास,
छुए क्यों मुझे विपुल सम्मान?
भूलो ऐ इतिहास,
खरीदे हुए विश्व-ईमान!!
अरि-मुंडों का दान,
रक्त-तर्पण भर का अभिमान,


लड़ने तक महमान,
एक पूंजी है तीर-कमान!
मुझे भूलने में सुख पाती,
जग की काली स्याही,
दासो दूर, कठिन सौदा है
मैं हूं एक सिपाही!
क्या वीणा की स्वर-लहरी का
सुनें मधुरतर नाद?
छिः! मेरी प्रत्यंचा भूले
अपना यह उन्माद!
झंकारों का कभी सुना है
भीषण वाद विवाद?
क्या तुमको है कुरु-क्षेत्र
हलदी घाटी की याद!
सिर पर प्रलय, नेत्र में मस्ती,
मुट्ठी में मनचाही,
लक्ष्य मात्र मेरा प्रियतम है,
मैं हूं एक सिपाही।
खींचो राम-राज्य लाने को,
भू-मंडल पर त्रेता!
बनने दो आकाश छेदकर
उसको राष्ट्रविजेता,
जाने दो, मेरी किस
बूते कठिन परीक्षा लेता,
कोटि-कोटि कंठों ‘जय-जय’ है
आप कौन हैं, नेता?
सेना छिन्न, प्रयत्न खिन्न कर,
लाए न्योत तबाही,
कैसे पूजूं गुमराही को
मैं हूं एक सिपाही?
बोल अरे सेनापति मेरे!
मन की घुंडी खोल,
जल, थल, नभ, हिल-डुल जाने दे,
तू किंचित् मत डोल!
दे हथियार या कि मत दे तू
पर तू कर हुंकार,
ज्ञातों को मत, अज्ञातों को,
तू इस बार पुकार!
धीरज रोग, प्रतीक्षा चिंता,
सपने बने तबाही,
कह ‘तैयार’! द्वार खुलने दे,
मैं हूं एक सिपाही!
बदलें रोज बदलियां, मत कर
चिंता इसकी लेश,
गर्जन-तर्जन रहे, देख
अपना हरियाला देश!
खिलने से पहले टूटेंगी,
तोड़, बता मत भेद,
वनमाली, अनुशासन की
सूची से अंतर छेद!
श्रम-सीकर, प्रहार पर जीकर,
बना लक्ष्य आराध्य
मैं हूं एक सिपाही, बलि है
मेरा अंतिम साध्य!
कोई नभ से आग उगलकर
किए शांति का दान,
कोई मांज रहा हथकड़ियाँ
छेड़ क्रांति की तान!
कोई अधिकारों के चरणों
चढ़ा रहा ईमान,
‘हरी घास शूली के पहले
की’—तेरा गुण गान!
आशा मिटी, कामना टूटी,
बिगुल बज पड़ी यार!
मैं हूं एक सिपाही। पथ दे,
खुला देख वह द्वार!!
देशभक्त हे! – आर. चेतनक्रांति

सपाट सोच, इकहरा दिमाग, दिल पत्थर।
सैकड़ों साल से ठहरी हुई काई ऊपर।
बेरहम सोच की ख़ुदकश निगहबान से फ़रार।
तुम जो फिरते हो लिए सर पे कदीमी तलवार।
तुमको मालूम भी है वक़्त कहां जाता है!
और इस वक्त से इंसान का रिश्ता क्या है!
तुम जो पापों को दान-दक्षिणा से ढकते हो।
और भगवान् को गुल्लक बना के रखते हो।
तुम जिन्हें चीखकर ताकत का भरम होता है।
ज़ुल्म से अपनी हुकूमत का भरम होता है।
तुम जिन्हें औरतों की आह मजा देती है।
जिनको इंसान की तकलीफ हंसा देती है।
तुम जिन्हें है ही नहीं इल्म कि गम क्या शै है।
कशमकश दिल की, निगाहों की शरम क्या शै है।
तुम तो उठते हो और जाके टूट पड़ते हो।
सोच की आंच पे घबरा के टूट पड़ते हो।
न ठहरते हो न सुनते हो न झिझकते हो।
राम ही जाने कि क्या-क्या अनर्थ बकते हो।
यूं कभी देश कभी धर्म कभी चाल-चलन।
असल वजह तो इस ग़ुस्से की है ये ठोस बदन।
इससे कुछ काम अब दिमाग़ को भी लेने दो।
ज़रा-सा गोश्त गमो-फिक्र को भी चखने दो।
जोशे-कमजर्फ इस मिट्टी को नहीं भाता है।
इसको दानां की उदासी पे प्यार आता है।
इसने हमलावरों को लोरियों से जीत लिया।
खून के वल्वलों को थपकियों से जीत लिया।
लेके लश्कर जो इसे जीतने आए बाबर।
इसका जादू कि उन्हीं से उगा दिए अकबर।
तंगनज़री से इसे पहचानना मुमकिन ही नहीं।
नफरतों से इसे पहचानना मुमकिन ही नहीं।
इसको जनना ही नहीं, पालना भी आता है।
सिर्फ भारत की मां नहीं, ये विश्वमाता है।

भारत मां की ध्वजा – सुब्रह्मण्य भारती | Hindi me गणतंत्र दिवस पर कविता

यह बहुमूल्य ध्वजा भारत मां की है देखो आओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ
कितना ऊंचा ध्वज-स्तंभ है
यह वंदे मातरम् लिखित है—
चमक रहा जो, फहर रही किस गति से दृष्टि टिकाओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओं
यह न मात्र रेशमी वस्त्र है।
झंझावातों से न त्रस्त है—
तूफानों से भी अविचल उड़ती है मोद मनाओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ
यहां इंद्र का वज्रायुध है
यहां तुरक का अर्धचंद्र है—
वंदे मां है मध्य, अमित गति का अनुमान लगाओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ
देखो ध्वजास्तंभ के नीचे
अद्भुत जन-समूह दृग मीचे
ये योद्धा कहते तन देकर ध्वज की आन बचाओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ
पंक्तिबद्ध यह दृश्य मनोहर,
युद्ध कवच शोभित छाती पर—
वीर शौर्यमय कितने चित्ताकर्षक हमें बताओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ
मधुर तमिलभाषी नर योद्धा,
रक्तिम आंखों वाले क्षत्रिय
केरल वीर, मातृपद सेवक
तुळुभाषी, तैलंग युद्धप्रिय
यम को त्रास दिखाने वाले—
वीर मरहठे, रेड्डी-कन्नड़।
जिनकी देव प्रशंसा करते—
वे हिंदी-भाषी योद्धा गण
जब तक धरती, धर्म-युद्ध है,
हिंदी नारियों में सतीत्व है।
वे राजपूत अटल जिनकी इस—
भू पर तब तक अमर कीर्ति है


वीर सिंधुवासी जिनको—
अभिमान ‘पार्थ की भू पर रहते’
बंगनिवासी जो न भूलते—
मां की सेवा मरते-मरते
ये सब देखो यहां खड़े हैं।
करके दृढ़ संकल्प अड़े हैं।
इनकी शक्ति और सबसे पूजित ध्वज की जय गाओ
सब मिल करके श्रद्धा और विनय से शीश झुकाओ