घर आने पर पत्नी मुझको डांटती रहती / अवधेश्वर प्रसाद सिंह


घर आने पर पत्नी मुझको डांटती रहती / अवधेश्वर प्रसाद सिंह
घर आने पर पत्नी मुझको डांटती रहती।
‘ई नै छो ऊ नै छो घर में’ भांजती रहती।।

मेरी बोली अच्छी उसको रात में लगती।
दिन होते ही घर में माथा चाटती रहती।।

नैहर जाने को हरदम बेहाल रहती है।
नैहर में गाछी-बिरछी को झांकती रहती।।

लाठी, सोटा लेकर जब तैयार हो जाते।
थर थर-थरथर-थर थर-थर थर कांपती रहती।।

लाचारी में उनको जब मैं पुनः मनाता हूँ।
तब से वह मेरी कमजोरी जानती रहती।।


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