दर्द की महफ़िल सजाना चाहती हूँ / अल्पना नारायण


दर्द की महफ़िल सजाना चाहती हूँ / अल्पना नारायण
दर्द की महफ़िल सजाना चाहती हूँ
साज़ छेड़ो, गुनगुनाना चाहती हूँ

यूँ ही रस्मन पूछ बैठी हाल-चाल
वो ये समझा दिल दुखाना चाहती हूँ

उम्र भर का साथ तो मुमकिन नहीं है
साथ पल दो पल बिताना चाहती हूँ

युद्ध में जब हो गया बेटा ‘शहीद’
माँ पे क्या गुज़री बताना चाहती हूँ

आग नफ़रत की बुझाने के लिए मैं
प्रेम की गंगा बहाना चाहती हूँ


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