कंजड़ी / अर्चना लार्क


कंजड़ी / अर्चना लार्क
गाँव में आते ही कंजड़ी एक गीत गाती थीं
वह था रोने का गीत
साथ में किशोर बेटी सुर मिलाती
सुर तेज़ होता जाता
और भीड़ जमा होती जाती

इसी बीच किसी घर से
एक औरत
एक मौनी चाउर, दाल, पिसान दे जाती
गाँव के मर्द लड़की को हाथ ऊपर कर नाचने को कहते
उनकी आंखें उसके ब्लाउज़ पर टिक जाती

कंजड़ी रोज़ अपना ठिकाना बदलतीं और गाती
कबिरा यह जग बौराना
सफ़र पर ही रहता उनका रोने का गीत
उनकी आँखें स्थिर होती थीं
वो गला फाड़कर गातीं
जैसे उन बेहिस आँखों और अपनी बेबसी को एकाकार कर विद्रोह कर रही हों

कंजड़ी अच्छे घर की अच्छी बहू बन क़िस्मत को रोती नहीं
बतकही करती थीं
लार टपकाती लोगों की आँखों को
अपने बदन पर झेलती रहतीं

एक दिन सुना है
लाठियों से लैस उन्होनें कुछ शोहदों की खूब पिटाई कर दीं बगल के गांव में
और निकल गईं कहीं दूर
अब कंजड़ी मेरे गाँव नहीं आती हैं ।


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