टार्च / अरुण देव


टार्च / अरुण देव
उजाले में यों ही पड़ा था आँखें बंद किए
जैसे वह कुछ हो ही नहीं
उसे तो जैसे अँधेरे की प्रतीक्षा भी नहीं
कि रौशन हो सके उसका होना

हाँ, अगर अँधेरा घिर आए
सूझे न रास्ता
उजाले तक न पहुँच पाए हाथ
वह आ जाता है ख़ुश-ख़ुश
और तब भी दिखती है रौशनी
वह कहाँ दिखता है

कभी-कभी फ़ोकस ठीक करना होता है
काटनी होती है कालिमा
नहीं तो बिखर जाता है प्रकाश
धुँधला पड़ जाता लक्ष्य

वह है वहाँ अब भी जहाँ चमक-दमक कम है
अँधेरी रात में उसके सहारे
किसी पगडंडी पर चल कर देखो
तब दिखता है उसका होना


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