तेरा अफ़साना छेड़ कर कोई / अभिषेक कुमार अम्बर

तेरा अफ़साना छेड़ कर कोई / अभिषेक कुमार अम्बर
तेरा अफ़साना छेड़ कर कोई
आज जागेगा रात भर कोई।

ऐसे वो दिल को तोड़ देता है
दिल न हो जैसे हो समर कोई।

रात होते ही मेरे पहलू में,
टूटकर जाता है बिखर कोई।

चंद लम्हों में तोड़ सब रिश्ते,
दे गया दर्दे-उम्रभर कोई।

इश्क़ करता नहीं हूँ मैं तुमसे,
कह के पछताया उम्रभर कोई।

मैं वफ़ा करके बा-वफ़ा ठहरा,
बेवफ़ा हो गया मगर कोई।

काट कर पेट जोड़े गा पैसे,
तब खरीदेगा एक घर कोई।

तेरे आने की आस में ‘अम्बर’,
देखता होगा रहगुज़र कोई ।

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