क्या तुम आओगे / अभिषेक औदिच्य


क्या तुम आओगे / अभिषेक औदिच्य
मैं अपने जीवन की देहरी पर बोलो,
दीप जला कर रख दूं, क्या तुम आओगे?

दे दूँ यदि तुमको मैं नव संसार प्रिये,
अपने जीवन पर पूरा अधिकार प्रिये।
अपना सुख तुमसे मैं साझा कर लूं तो,
जीवर भर के नाते का व्रत धर लूं तो।
अधिक नहीं अभिलाषा मेरी है तुमसे,
क्या मेरे कुमकुम से माँग सजाओगे?

अक्षत-कलश गिरा कर दो थापें देना,
फिर मेरे घर को भी अपना कर लेना।
अपने केशों में भरकर तुम पानी को,
मुझे उठाना किरणों की अगवानी को।
आँगन की तुलसी मैया को जल देकर,
अम्मा वाले भजनों को क्या गाओगे?

मेरे कुल की मर्यादा का मान प्रिये,
सबसे पहले रक्खोगे क्या ध्यान प्रिये?
तुमको मैं बतलाऊँ जीवन कैसा है,
बिल्कुल तपते कंटक पथ के जैसा है।
पहले ही निश्चित कर लो कंटक पथ पर,
कदम मिलाकर क्या संग-संग चल पाओगे?


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