कवि / अपर्णा भटनागर


कवि / अपर्णा भटनागर
जब धूप जंग करती
अपने हौसले दिखाती है
तो अक्सर छाँव का एक टुकड़ा
उसे मुस्कुरा कर देता हूँ
और हथियार
छोड़ जाती है धूप
इस कदर मेरे आँगन में
कि सूरज सहम कर देखता है-
आकाश में कर्फ्यू लगा है
बिना पथराव के?
चाँद से बहस –
उसका संविधान लिखने की-
बिना प्रारूप
खीँच लाता हूँ उसे
उन हाशियों में
जहाँ प्रश्न नहीं उत्तर लिखा है?
समय को
निब की नोक पर रख
न जाने कितने हल चलाता हूँ आखरों के
कि दबी सभ्यताएँ कुनमुनाती
अपने वैधव्य से बाहर
देखती हैं कनखियों से
खोये ठाठ खंडहर पर
इतिहास का बिरवा लगा है?
क्यों जानते नहीं मुझे?
दंभ या सृजन?
प्रलय या विलय?
अस्ति या नास्ति?
मन को खंगालो
तुम्हारी संवेदनाओं की स्याही हूँ
बोलो क्या लिखना बंद करूँ?


Leave a Reply

Your email address will not be published.