मैंने ख़ाकों में कई रंग भरे हैं अब तक / अनु जसरोटिया


मैंने ख़ाकों में कई रंग भरे हैं अब तक / अनु जसरोटिया
मैं ने ख़ाकों में कई रंग भरे हैं अब तक
मेरी आँखों ने कई ख्वाब बुने हैं अब तक

कितने ख़त मैं ने तिरे नाम लिखे हैं अब तक
कितने दिन उन के जवाबों में कटे हैं अब तक

मुस्कुराहट के न क्या फूल बिखेरोगे कभी
हम को तो राह में काँटे ही मिले हैं अब तक

गो भलाई को नहीं रास हवा दुनिया की
फिर भी कुछ लोग ज़माने में भले हैं अब तक

कोई हँसता हुआ चिह्न भी मिलेगा शायद
सहमे-सहमे से बहुत लोग मिले हैं अब तक

ज़िँदगी तू ने फ़क़त एक हँसी की ख़ातिर
ज़हां के छलके हुए जाम पिये हैं अब तक

हँसना चाहा है तो देखा है ‘अनु’ ये मैं ने
मेरे नग़्मात भी अश्कों में ढले हैं अब तक।


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