सृष्टि जो हमने रची / अनुराधा सिंह


सृष्टि जो हमने रची / अनुराधा सिंह
धरती जो मिलकर गोल की हमने
उत्तरी दक्षिणी ध्रुव के बीच
उस पर अकेली कैसे बसूँ अब

कहाँ से ढूँढ़ लाये थे चकमक
जब सुलगाया हमने सूरज
एक कमरे में दिन जलाया एक में बुझाई रात
आज कल वही धूप मेरी चादर परदे आँखें
सुखाने के काम आ रही है

हवा से कहो अपने बाल
बाँध कर ही रखती हूँ इन दिनों
बस उतनी ही बहा करे
जितनी मेरे फेफड़ों में जगह है
जितनी निःश्वास लौटा पाती हूँ जंगल को

एक रात काले जादू से स्याह की तुमने
मैंने टाइटेनियम टू से रंगा चाँद
एक निरभ्र था
जिसे आर्कटिक रंग से ढँक दिया था
कि मुझे नीला पसंद है

अक्सर यह सोचती हूँ
एक प्रेम का भी निर्माण किया था हमने
वह कहाँ गया भला
क्या तुम्हें भी बुरा लगता है
हमारी साथ साथ बनायी सृष्टि में
यूँ अकेले अकेले रहना


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