आसान है हमें मनोरोगी कहना / अनुपम सिंह


आसान है हमें मनोरोगी कहना / अनुपम सिंह
रात अनेक सपनों का कोलाज होती है
कई रातों के सपने अभी भी याद हैं
बचपन में पढ़ी कविताओं की तरह
सपने के एक सिरे से दूसरे सिरे का मतलब
अभी भी पूछतीं हूँ सबसे ।

आखिर ! पश्चिम दिशा में साँप उगने का क्या मतलब होता है ?
कुछ सपने, जो गाँव में आते थे
अब शहर की अनिद्रा में भी आने लगे हैं
एक आदमकाय, सींगवाला जानवर
धुन्धभरी रातों में दौड़ता है
मेरे पैरों में बड़े-बड़े पत्थर बान्ध देता है कोई उसी क्षण

पैर घसीटते हुए, घुस गई हूँ अडूस और ढाक के जँगल में
अब वह जँगल ,जँगल नहीं एक सूनी सड़क है
उस साँय-साँय करती सड़क पर मैं भाग रही हूँ ।

रात को सोने से पहले ही
दिन चक्र की तरह घूम जाता है
आज फिर दूर वाले फूफा जी आए हुए हैं
वे आँखो से, मेरे शरीर की नाप लेते हुए
अभिनय की मुद्रा मे कहते हैं –
अरे ! तुम इतनी बड़ी हो गई
मेरे बाएँ स्तन को दाएँ हाथ से दबा देते हैं ।

वह डॉक्टरनुमा व्यक्ति फिर आया हुआ है
जो मेरे गाँव की सभी स्त्रियॉं का इलाज करता है
पूछता है – पेशाब में जलन तो नहीं होती
एक प्रश्न हम सभी की तरफ़ उछालकर
जाड़े की रात में भी ग्लूकोज चढाता है
और रात भर उन औरतों का हाथ
अपने शिश्न पर रखे रहता है ।

फिर सपने में आते हैं कुछ मुँहनोचवे
जो स्कूल जाती लड़कियों को बस में भर ले जाते हैं
छटपटाहट में नीन्द खुलती है
मुझे अपना चिपचिपाया हुआ बिस्तर देखकर घिन्न आती है ।

बीच की छूटी तमाम रातों में डरी हूँ
जिस रात, मैं उन देवताओं से गिड़गिड़ाती हूँ
कि अब कोई और सपना मत दो मेरी नीन्द में
उसी रात, पता नहीं कब, कहाँ, कैसे निर्वस्त्र ही चली गई हूँ ।

सभी दिशाओं से आती हुई आँखे मुझे चीर रही हैं
वे मेरी देह पर अनेक धारदार हथियारों से वार करते हैं
मुझे सबसे गहरी खाई में फेंक देते हैं वे
मेरी साँस फूल रही है, मेरी देह मेरे विस्तार से थोड़ा उठी हुई है
मैं सबसे पहले अपने कपड़े देखती हूँ ।

बगल में सोयी माँ पूछ रही है – क्या कोई बुरा सपना देखा तुमने
मैं कहती, नही, अम्मा तुम सो जाओ
मैं सोच रही हूँ कि फ़्रायड तुम ज़िन्दा होते
तो इन सपनों को पढ़ कर कहते
कि यह मनोरोगी है ।


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