वैश्या – 2 / अनुपमा तिवाड़ी


वैश्या – 2 / अनुपमा तिवाड़ी
वैश्या,
जुमले बहुत गढ़े हैं समाज ने
तुम्हारे लिए.
तुम्हारा होना भी चिरकाल से स्वीकारा है
समाज ने.
जायज भी ठहराया है
कहते हुए कि
यदि वैश्याएँ नहीं होतीं तो व्याभिचारी कहाँ जाते ?
लेकिन सबसे निकृष्ट कही जाने वाली वैश्या
तुम तो शिव के समान हो गई हो
तुमने समाज का विष रख लिया है कंठ में
जो निगल जातीं तो नहीं बचतीं
और उगल जातीं तो फ़ैल जाता ये विष
चौराहों से घरों तक.


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