कुएँ / अनिल गंगल


कुएँ / अनिल गंगल
सदियों से
हाथों, बाल्टियों और घिरनी के घूमने के साथ
छलछलाते रहे हम जीवन से भरपूर
कितनी बार हमारे आकाश में सुनाई दिए मंगलगीत
हमारे जल में सिरजे गए कितनी ही बार
कुआँ पूजन करती स्त्रियों के स्वस्तिक
रखे गए हमारी मुण्डेरों पर सद्यप्रसूता स्त्रियों के
सर पर रखे गए मंगल-कलश
कुएँ नहीं
बार-बार वंशबीज धारण करती सुहागन स्त्रियों के
उर्वर गर्भ हैं हम
न जाने कितनी-कितनी दिशाओं से
आए कितने ही थके-हारे भूले-भटके राहगीर
हमारी जगत पर दो घड़ी बैठ उतारी उन्होंने राह की धूल
पिया हमारे गर्भ में संचित सप्तसिन्धुओं का जल
हमारे जल में घुला है
उनकी तृप्त आत्माओं के असंख्य आशीर्वादों का अमृत
समुद्रों झीलों नदियों नहरों के साथ
धरती से जुड़ी थी हमारी भी नाल
धरती को खोद पानी निकाल सकने वाले हाथों के पुरुषार्थ से
हम प्रकट हुए दृश्य में
धरती पर भूख-प्यास की उम्र जितनी ही है
हमारी भी उम्र
द्वापर में ब्रह्मास्त्र के प्रहार से
जब सूख चले थे जल के सारे स्रोत
तब भी हरे रहे आए हम
आने वाले वक़्त के लिए बाँझ नहीं हुई एकदम
हमारी कोख़
यूँ नहीं रहा चलन अब
हाथोंहाथ ताज़ा और ठण्डा पानी निकालने और पीने का
तो भी पाइपलाइनों में दौड़ते बासी पानी के युग में
जमे हैं हम अभी भी धरती की छाती पर
गाँव के भूले-बिसरे बुज़ुर्गों की तरह
हमारी गहराई में छिपी हुई है
उत्सव और उल्लास की गूँज
हमारी दीवारों से टकरा कर मुखर होती हैं
कुँआरी माँओं और हताश मृतात्माओं की चीख़ें।


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