भूगोल / अनिल कार्की

भूगोल / अनिल कार्की
भूगोल जिसे गीत की तरह गाया है
चरवाहों ने
उनसे ही सुना मैंने

कि चोटी का होना अलग बात ठैरी
चोटी में रहना अलग बात!
जबकि चोटी से गिरना एक घटना है
ठीक चोटी में चढ़ने की तरह

भूगोल जिसे गीतों की तरह गाया गया कभी
आज उसे ही राजनीति शास्त्र में
पाठ की तरह पढ़ाया जा रहा है
समाजशास्त्र में अस्मिताओं के लिए
भूगोल की खींचतान हो रही है

दुनिया का गोल होना अलग बात है
धरती का थोड़ा-सा विनम्र होकर
झुक जाना एक बात है
जबकि धरती का चपटा होना एक घटना है

भूगोल जिसे
गाया गया
वह अब कितना अलग हो गया है
जबकि गाँव आज भी दाखिल हैं दुनिया के नक़्शे में
और शहर आज भी दौड़ रहे हैं
दुनिया के भीतर
मैं कहीं किसी जगह
टाफ़ियों के रैपर देखता हूँ
चमकीले और आकर्षक
तो आज भी समझ जाता हूँ

बात बहुत अलग है
जैसे कि इजा का यह वचन
किस हड़बड़ी में हो
रुको, बैठो, पानी पी लो
दुनिया कहीं नहीं भागती
बिन इंसान के

भूगोल जिसे गाया जाएगा भविष्य में
ज़मीनों के नाम पर, भाषा के नाम पर
सीमाओं के नाम पर
और कविता के नाम पर भी

उनमें निःसन्देह होंगे
उल्लू, सियार, भेड़िये, और तेन्दुए भी
रात को सुबह कहने वाले
हर सुबह हूँकने वाले
झुण्डों में शिकार करने वाले
और पीठ पीछे से झपटने वाले

ऐसे जानवर
जंगलों में न जाने कब से बसते हैं
गहन काली रोशनी वाले दिनों में
बल्कि अब तो बाज़ार से नए दाँत
डलवा लिए हैं उन बूढ़े भेड़ियों ने
और शहर
उन्हें बहुत
सहिष्णु
बताता आया है

जबकि हासिल लगा आदमी एक दहाई में बढ़ता नहीं
बेचारा घट जाता है
जिसे मैं भ्यास[1] कहता हूँ
आप बिजूका कह सकते हैं
दिक्कत भाषा की कतई नहीं है
दिक्कत भ्यास की है

जैसे कि
हुक्के में आग पानी और साँस है, धुआँ है
जैसे कि बहुत दुनिया है
दुनिया के बाहर भी, अन्दर भी
पलायन की सम्भावनाएँ घटी नहीं हैं
बल्कि विकास के साथ बढ़ गई हैं
सस्ती नागरिकताओं के साथ
आप दाखिल हो सकते हैं ऐसी जगहों पर
जहाँ कवि कविताएँ लिखते हैं
जबकि दूसरे उन्हें लाइक करते हैं!

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