भारत छोड़ो आन्दोलन / अनिल अनलहातु


भारत छोड़ो आन्दोलन / अनिल अनलहातु
यह उस समय की बात है
जब लोगबाग अपने चेहरे को
गर्दन से हटाकर
अपनी हथेलियों में रख
भय और आश्चर्य से
घूरा करते थे ।

एक आदमी
जो दो शून्यों को जोड़ कर
अनन्त (00) बनाया करता था,
अचानक ही उन शून्यों को
एक के ऊपर दूसरा रख
एक खोखला ड्रम बना
उसके भीतर बैठ
लुढ़कने लगा ।

यह वह वक़्त था
जब लोगबाग
आपस में बातें करते
एक-दूसरे के पैर नहीं देखा करते थे,
यह वह शानदार और बहादुर वक़्त था
जब कुछ सनकी और कूढ़मगज नौकरशाह
जनतन्त्र की कमोड पर
नैतिकता से फ़रागत हो रहे थे
एक आदमी अचानक ही कहीं से
चीख़ता हुआ आया
और ’मुक्तिबोध’[1] की खड़ी पाई की
सूली पर लटक गया ।

यह कतई ’मुक्तिबोध’ की
ग़लती नहीं थी
क्योंकि पूरा देश ही
’पाई’ और ’खाई’[2] के नाम पर
बिदका हुआ था
बूढ़े बुड़बुड़ाते सुअरों की तरह
पास्कुआल दुआर्ते[3] के
छोटे अबोध भाइयों के
कान चबा रहे थे,

और बड़े चोली के पीछे छुपे[4]
सत्य को पकड़ लेने को बेताब थे
जबकि युवाओं की एक लम्बी कतार
’धूमिल’ के स्वप्नदोषों से लेकर
’गोरख पाण्डे’ की दालमण्डी[5] तक
पसरी पड़ी थी,
और मैं था कि
लगातार अपने आप से भागते हुए
फिर-फिर अपने तक ही
पहुँच रहा था ।

भागने और फिर भी
कहीं नहीं पहुँचने की यह लम्बी दास्ताँ
शायद
उधार मे मैंने
अपने बाप से ली थी
जो लगातार ग्रामोफ़ोन पर
उदास, तन्हा और ग़मगीन गाने सुनता रहा
और श्मशान को
शहर से बाहर कर देने का
सुझाव देता रहा
कुछ ’रघुवीर सहाय’ की कविता
की इस पँक्ति के तर्ज पर कि
’कल मैं फिर एक बात कहकर बैठ जाऊँगा’[6] ;

कहने और फिर बैठ जाने के बीच के
फासले को वह
’विनोद कुमार शुक्ल’ के
’बड़े बाबू’[7] की तरह
नौकर की फटी कमीज़ की भाँति
जतन से तहिया कर
रख दिया करता था,

यद्यपि वह अपनी उम्र के दस के पहाड़े
के उस पड़ाव पर ही था
जब हॉलीवुड की हीरोइनें
अपने जवान होने का ऐलान
करती हैं,
वह अपनी मौत से कई-कई बार
गुज़र चुका था
अपने कन्धों पर उसने
कई-कई लाशों के वजन
सहे थे;

वह टूटता जा रहा था
…………………
…………………
और मै ………..

कि ठीक इसी वक़्त मुझे
मेरे उस दोस्त ने
बचा लिया था
जो तब बम्बई मे था
और उस आदमी के बारे में
बताता रहता था
जो बाम्बे वी०टी० की भीड़ भरी सड़कों पर
कुहनियों एवं टखनों से
अपने लिए जगह बनता चलता था,

वह स्तब्ध था
और मैं…….
पटना के तारघर की मेज़ पर
किसी ’अजनबी’[8] द्वारा लिखित
अपनी सुईसाईड नोट का
टेलीग्रामी मज़मून
पढ़ रहा था

लेकिन ठहरें, क़िस्सा यहीं ख़त्म
नहीं होता
(जैसे ख़त्म नहीं होती कोई कविता)
अपार भीड़ के
उस निर्जन सूनेपन मे
वह कई-कई बार
अपनी मौत की सण्डास पर
जाकर मूत आया था
(यद्यपि यह तय है कि कुछ भी तय नहीं है )
फिर भी यह तय है कि वह बहुमूत्र रोगी नहीं था

यह तो उसने बाद में बताया
तब मैं
इतिहास की पुस्तकों में उलझा
’उपालि’ और ’आनन्द’[9] से
ज़िन्दगी का पता पूछ रहा था,
उस ज़िन्दगी का
जो किसी अमीर के ऐशगाह मे लेटी
जनतन्त्र और समाजवाद के
ख़्वाब देखा करती थी
और मैं था कि …….
…………………….
लगातार
लगातार
इतिहास की पुस्तकों
मे खोया………

और आज़ादी मिलने के
बयालिस साल बाद
मुझे यह पता चला है कि
दरअसल वह
’क्विट इण्डिया मूवमेण्ट’ था
जिसे मैं आज तक
’भारत छोड़ो आन्दोलन’
समझ रहा था


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