अथ शुम्भ-निशुम्भोपाख्यान / अनिल अनलहातु


अथ शुम्भ-निशुम्भोपाख्यान / अनिल अनलहातु
सहस्राब्दियों के अपमान
और गुस्से को
ढोलक की थाप पर निकालते हुए
हम एक आर्त रुदन में
नाचते हैं;
ढोलक और नगाड़ा पीटते हुए
लेते हैं बदला अपने अपमान का,
जलालत का,
गुस्से में पीटते चमड़े के ढोल को
औ’
नाचते हैं
“या देवी सर्वभूतेषु शक्तिरूपेण संस्थिता”
……………………………………
किन प्राणियों में संस्थित हों देवी
शक्ति रूप में ?
क्या विजेताओं की क्रूरता में ?
या घातक विध्वंसक षड्यन्त्रकारियों की भुजाओं में ?
ताकि कर सकें होलोकास्ट (सर्वनाश)
एक शान्तिप्रिय और अहिंसक सभ्यता का ।

हम दास हैं या दस्यु
या फिर असुर हैं,
राक्षस हैं,
‘दिति’ के पुत्र
देवों के भाई दैत्य हैं,
हम द्रविड़ हैं
अनास हैं
अनार्य हैं ?

अपने ही बन्धु-बान्धवों की
हत्यारी देवी की आरती में
नाचते
सुध-बुध खोए
हम कौन हैं ?

समाज के बाहर
नगरों से बहिष्कृत
वह ढोल जो हमारे गले में था[1]
कैसी चालाकी हे देवि !
कि वह तेरी आरती में
बजाया जा रहा
और हम अपने ही पूर्वजों
के हत्यारे की उपासना के
जश्न में नाच रहे हैं !

शहरों–नगरों और सभ्य समाज से
निकाले गए
हम रोमा जिप्सी[2] हैं ?
जहाँ ख़त्म होता है शहर
और शहर की गन्दगी होती है जमा
वहीं कहीं जरायमपेशा झोपड़ियों में
या फिर हार्लेम
या घेट्टो[3] में,
न्यूयार्क की काली बस्तियों में
लैंग्स्टन ह्यूज़ के उदास गीतों में
गैर शास्त्रीय और लोकसँगीत
और आदिम नृत्यों में
ख़ुद को भुलाए रखा ।

अच्छा होता
नष्ट हो गए होते हम
’इँकाओं’ और
‘मय’ की तरह
या फिर
‘रेड इण्डियनों’ या
‘एजटेक[4] की तरह ।
 
हम, हम न होते
हम वही होते, जो हम न होते
अच्छा होता बेबीलोन नष्ट हो गया होता
दजला-फ़ुरात नदियाँ सूख जातीं
अवश गुलामी की चरम परवशता

जब ‘हम्मूराबी’[5] भी मैं हूँ
मुद्दई भी मैं ही हूँ
मुद्दालाह भी मैं हूँ
जज की कुर्सी पर
मैं ही आसीन हूँ;[6]
जिरह मैं ही करूँगा
और ख़ुद को सज़ा (-ए-मौत ) भी
मैं ही दूँगा ।

किस कसूर की
मालूम नहीं,
क्योंकि मैं एक द्रविड़ हूँ
और रावण भी द्रविड़ था, एक राक्षस था ।

और साथ ही वह एक ब्राह्मण भी है
एक (विश्रवा) मुनि का पुत्र है
और परम ज्ञानी है
और वे उसे मारते हैं
और मरते हुए रावण से शिक्षा लेते हैं,

और हम … (हम रावण के वंशज)
रावण के पुतले में आग लगाते है;
कमज़ोर और निष्कपट पर
षड्यन्त्र और धूर्तता और चालाकी की जीत
‘“या देवी सर्वभूतेषु हत्यारी रूपेण संस्थिता ,
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः ।”


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