पीनस वारो प्रवीन मिलै तो कहाँ लौ सुगंधी सुगँध सुँघावै / अज्ञात कवि (रीतिकाल)


पीनस वारो प्रवीन मिलै तो कहाँ लौ सुगंधी सुगँध सुँघावै / अज्ञात कवि (रीतिकाल)
पीनस वारो प्रवीन मिलै तो कहाँ लौ सुगंधी सुगँध सुँघावै ।
कायर कोपि चढ़ै रन मे तो कहां लगि चारन चाव बढ़ावै ।
जो पै गुनी को मिलै निगुनी तौ कहै क्योँ करि ताहि रिझावै ।
जैसे नपुंसक नाह मिलै तो कहाँ लगि नारि सिँगार बनावै ।

रीतिकाल के किन्हीं अज्ञात कवि का यह दुर्लभ छन्द श्री राजुल महरोत्रा के संग्रह से उपलब्ध हुआ है।


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