भाई के लिए… / अजित सिंह तोमर


भाई के लिए… / अजित सिंह तोमर
लगा ऐसा कई बार कि
तुम बदल गए
और रच ली तुमनें अपनी एक ऐसी दुनिया
जहाँ पग पग पर खारिज़
हो रही थी मेरी मान्यताएं

सामाजिक गौरव का संयुक्त हिस्सा बनना था हमें
मगर तुम उलझ गए अपनी ही दुनिया में
जैसे जैसे हम बड़े हुए
छोटी होती गई हमारी दुनिया
और साफ तौर पर अलग भी

पारिवारिक अवसरों पर हम मिलतें रहे
एक औपचारिक गर्मजोशी के साथ
मगर जैसे ही पैतृक घर छूटता
छूट जाती थी हमारी अपनत्व की लगाम
हमें विजयी करनी थी अपनी अपनी दुनिया
बनना था कहीं श्रेष्ठ पति तो कहीं श्रेष्ठ पिता

कई बार सोचता हूँ
जब जब गहराया जीवन में धन का संकट
तुम याद क्यों नही आए
क्या तो याद आया पिता
या फिर वो दोस्त
जिनसे मुद्दत से रिश्तें रहें है मेरे खराब
तुम भाई थे मेरे मगर मुश्किल वक्त पर
दोस्त से कम अधिकार महसूस किया मैंने
कमजोर पड़ती गई हुलस कर गले लगनें की चाह

एक रक्त हमारी शिराओं में बहता है
मगर इसके जमनें और बहनें के बिन्दू क्यों है भिन्न
ये बात मुझे पूछनी थी किसी रुधिर विज्ञानी से

ऐसा नही मेरे मन तुम्हारे प्रति कोई व्यक्तिगत आक्रोश है
शायद एक समय के बाद
भाई हो ही जातें है बेहद एकांतिक और आत्मकेंद्रित
दफ्तर और घर की जिम्मेदारियां
धीरे धीरे लील लेती है उनका भाईपना

यह भी सम्भव है
ठीक यही शिकायतें तुम्हें मुझसे हो
समझा जाता रहा हूँ मैं भी इतना ही आत्मनिष्ठ और मतलबी भाई
मगर भाई को भुजा कहने के वाले शास्त्र
अब न जाने को क्यों सच्चें नही लगतें

एक ही पीढ़ी में हम भाई के रूप में
कितनें रूपांतरित हुए
और बना ली अपनी समानांतर दुनिया
इसे कई गुना बदलेंगी हमारी सन्तानें
यह मेरा भविष्य का स्थाई डर है
चाचा-ताऊ की होने के बाद भी
उनमें पसरा रहेगा एक ख़ास किस्म का अजनबीपन
नही होगा उनके मध्य कोई पवित्र अनुराग
वें कर रहे होंगे एक दूसरे से प्रतिस्पर्धा
संपत्ति और सफलता तय कर रही होगी उनकी निकटता और दूरी

ये देख कर बतौर भाई मुझे अच्छा नही लगेगा
शायद तुम्हें भी न लगें
मगर तुम कह न पाओगे
ये बात मुझे पता है

मैं कह रहा हूँ महज इसलिए
तमाम असहमतियों और शिकायतों के बावजूद
मुझे तुम्हारी जरूरत हमेशा होती है महसूस
तुम्हारे रहते लगता है
मेरे किसी भी लौकिक अपमान का बदला तुम जरूर लोगे एकदिन
मेरे बच्चों को डांट दोगे उतने ही अधिकार के साथ
यदि देखोगे उन्हें गलत चलता हुआ

मेरे भाई मेरे दोस्त मेरे दुश्मन
बस इतनी सी बात है
हम दोनों ही बदलतें बदलतें इस तरह बदल गए
कि एक दूसरे को भाई के रुप में नही रख पातें याद
हमारी साँझा स्मृतियां तेजी से हो रही समाप्त
इससे पहले हम अपने पिता की दो इकाई रह जाए
और भूल जाए हम अपना संयुक्त बचपन

भाई को भाई मिलते रहना जरूरी है
उससे उसकी दिक्कतें पूछता रहना भी जरूरी है
अतीत में अटका रहना भी उतना ही जरूरी है
यही वो तरीका है
जो बचा सकता है
भाई से भाई का रिश्ता
न्यूनतम पारस्परिक सम्मान
और मिलनें की चाह
हमारा अतीत ही जोड़े रख सकता है अब हमें
क्योंकि
वर्तमान और भविष्य दोनों में
भाई कहीं भाई के पास नही दिखता मुझे
इसी यथार्थ ने अँधा कर दिया है मुझे
और मैं गलतफ़हमियों का रास्ता पार करने के लिए
तलाश रहा हूँ भाई का हाथ।


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