अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया / अज़ीज़ आज़ाद


अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया / अज़ीज़ आज़ाद
अपनी नज़र से कोई मुझे जगमगा गया
महफ़िल में आज सब की निगाहों में छा गया

कल तक तो इस हुजूम में मेरा कोई न था
लो आज हर कोई मुझे अपना बना गया

आता नहीं था कोई परिन्दा भी आस-पास
अब चाँद ख़ुद उतर के मेरी छत पे आ गया

जो दर्द मेरी जान पे रहता था रात-दिन
वो दर्द मेरी ज़िन्दगी के काम आ गया

हैरान हो के लोग मुझे पूछते हैं आज
‘आज़ाद’ तुमको कौन ये जीना सिखा गया


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