पारखी संत / अछूतानन्दजी ‘हरिहर’


पारखी संत / अछूतानन्दजी ‘हरिहर’
भेद कोई सन्त पारखी जाने। टेक
भरमि-भरमि माया में भटकें, जग में फिरें भुलाने।
ब्रह्मजाल के पड़े फंद में, निश दिन रहत दिवाने॥
सीपी को चाँदी, रस्सी को झूठहि सर्प बखाने।
राजपुत्र को ईश्वर माने, रूपहि रहत लुभाने॥
वेदवाद को मर्म न जाने, कर्ता में उलझाने।
जल स्नान को धर्म बखाने, जाति बरन अभिमाने॥
करे जलशयन अग्नी तापे, धरती रहे समाने।
कंठी छाप तिलक माला के, भेस रचै मनमाने॥
नाचै थिरकै कूल्ह उछालै, गाय सुरीले गाने।
लय सुर ताल पै तालि बजावे, आँखी ऐंचै ताने॥
काम क्रोध लालच के चेरे, राग-द्वेष लपटाने।
दर्शन ज्ञान चरित नहिं जाने, शील न कबहुँ पिछाने॥
आतम-अनुभव ज्ञान न “हरिहर” , मन-बुधि नहीं ठिकाने।
देय दृष्टि कोउ संत पारखी, सकल तत्व पहिचाने॥


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