दिल-ए-फ़सुर्दा में कुछ सोज़ ओ साज़ बाक़ी है / अख़्तर अंसारी


दिल-ए-फ़सुर्दा में कुछ सोज़ ओ साज़ बाक़ी है / अख़्तर अंसारी
दिल-ए-फ़सुर्दा में कुछ सोज़ ओ साज़ बाक़ी है
वो आग बुझ गई लेकिन गुदाज़ बाक़ी है

नियाज़-केश भी मेरी तरह न हो कोई
उमीद मर चुकी ज़ौक-ए-नियाज़ बाक़ी है

वो इब्तिदा है मोहब्बत की लज्ज़तें वल्लाह
के अब भी रूह में इक एहतराज़ बाक़ी है

न साज़-ए-दिल है अब ‘अख़्तर’ न हुस्न की मिज़राब
मगर वो फ़ितरत-ए-नग़मा-नवाज़ बाक़ी है


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