इंतज़ार / अंचित


इंतज़ार / अंचित
पेड़ की टहनियों से सर टिकाये
गौरया इंतज़ार करती है बारिश का
नदी बादलों का
और मजदूर शीत में,
गिर रहे मकान के बगल में
एक रुखड़ी दीवार के साथ जुड़े चार ईंटों में
लगाकर कुछ सीलन लगी लकडियाँ
इंतज़ार करता है आंच का।
लम्बी लाईन में लोग
बिल भरने, टिकट बुक करने
रजिस्ट्री जमा करने खड़े रहते हैं
अलग अलग जगह।
भीड़ आन्दोलनों का इंतज़ार करती है
फिर चुनावों का, फिर सरकारों का
फिर बिलों का, फिर उनके कानून बनने
उनके लागू होने का।
आदमी गुज़ार देता है पूरी-पूरी उम्र
सचिवालयों, अदालतों, पंसारियों के
आगे हाथ फैलाए करते हुए
इंतज़ार।
हर रात आखिरी बस के इंतज़ार में खड़ा रहता है
राजधानी के एक छोटे बस स्टॉप पर
अकेला रामआसरे।
सदी के पिछले छोर से ही
अंगूरों के लत्तर के पास कोई रोमियो खड़ा है
अयोध्या के शाह करते हैं लम्बा इंतज़ार
बारिशों के गुजरने का,
अशोक कलिंग युद्ध के बीत जाने का इंतज़ार करता है
बुद्ध तक जाने से पहले।
इतिहास इंतज़ार करता है कि
रेत उसके खाने में आये जल्दी।
आप जहाँ भी खड़े हो जाएँ
आपको बस इंतज़ार करते लोग दिखाई देंगे।
सब के सब कहीं न कहीं
किसी के आगे, किसी के पीछे
डकारते, पसिनाते, उबकाई लेते
या मुस्कुराते हुए करते रहते हैं
जाने किसका इंतज़ार ।
कवि एक हाथ की उँगलियों से
दुसरे हाथ की रेखाएँ गिनता हुआ
देखता हुआ हथेली के पीछे की झुर्रियाँ
इंतज़ार करता है
कि सामने सफ़ेद कागज़ पर
अपनी कलम से उतार सके
अपने समय के सच का फोटो स्टेट।
वक़्त आने पर
कागज़ के निचले हिस्से पर
छोड़ता है बस अपने हस्ताक्षर
और पूरे पन्ने पर बस झूठ।
जब आपने जीवन भर सीखा होगा
बस इंतज़ार करना
बारी आने पर लाज़मी है
हडबडा जाना।


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