बहुप्रतीक्षित झूठ पर सब मुग्ध हैं / अंकित काव्यांश


बहुप्रतीक्षित झूठ पर सब मुग्ध हैं / अंकित काव्यांश
बादलों ने ढँक लिया आकाश है बहुप्रतीक्षित झूठ पर सब मुग्ध हैं।

मालकिन ने कल जरा सी बात पर
पीट डाला एक नौकर को कहीं।
योजना फ़ौरन बनी उस रात में
चोर बन कर घुस गया नौकर वही।

आज उसके गाँव में उल्लास है, रात की उस लूट पर सब मुग्ध हैं।

उल्लुओं के न्याय में दिन था नहीं
रात वाली बात को धोखा कहा।
चोर नौकर, मालकिन या न्याय था
अब बताओ कौन दोषी था वहाँ।

मामला अब ज्योतिषी के पास है, ग्रहों में इस फूट पर सब मुग्ध हैं।

क्या ग्रहों की चाल होगी क्या पता
एक तांत्रिक खोज नौकर ने लिया।
बाँध कर ताबीज है संतुष्ट वो
मुस्कुरातीं हैं इधर अब रूढ़ियाँ।

हर जगह प्रतिशोध का इतिहास है,भावना के ठूँठ पर सब मुग्ध हैं।


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